MBBS के लिए विदेश क्यों? हर साल डॉक्टर बनने जाते हैं लाखों बच्चे, भारत की पढ़ाई का AtoZ जानकर होगी हैरानी

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DESK : यूक्रेन और रूस के बाच जंग थमता नजर नहीं आ रहा. यूक्रेन (Ukraine) में फंसे भारतीय छात्रों को वापस लाने के लिए सरकार ‘ऑपरेशन गंगा’ चला रही है. इस बीच लगातार ये सवाल उठ रहा है की आखिर क्यों इतनी ज्यादा संख्या में भारतीय छात्रों को विदेश में जा कर पढ़ने की जरुरत पड़ रही है. यूक्रेन में फंसे छात्र वहां मेडिकल (MBBS) की पढ़ाई करने गए हुए थे. ऐसे में तमाम तरह के सवाल उठ रहे हैं. जैसे क्यों इन छात्रों को मेडिकल की पढ़ाई के लिए दूसरे देश का रुख करना पड़ा. क्या ये बच्चे भारत में रह कर मेडिसिन की पढ़ाई नहीं कर सकते थे? अगर नहीं तो वजह क्या है.. क्या ये छात्र काबिल नहीं हैं या हमारे पास संसाधन की कमी है.

अगर आकड़ों पर नजर डालें तो भारत के करीब 11 लाख 33 हजार 749 छात्र भारत से बाहर विदेशों में रह कर पढ़ाई कर रहे हैं. कनाडा में 2 लाख 15 हजार 720, अमेरिका 2 लाख 11 हजार 930, ऑस्ट्रेलिया में 92 हजार 383, सऊदी अरब में 80 हजार 800, यूनाइटेड किंगडम 55 हजार 465, ओमान 43 हजार 600, न्यूजीलैंड 30 हजार, चीन 23 हजार, जर्मनी 20 हजार 810, यूक्रेन में 18 हजार वहीं रूस में 16 हजार 500 स्टूडेंट्स पढ़ाई करने गए हुए हैं. जबकि अन्य 88 देश में भारत के कुल 3 लाख 25 हजार 541 स्टूडेंट पढ़ाई करने गए हुए हैं.

ये तो हुआ सभी क्षेत्रों के स्टूडेंट्स का डाटा. बात अगर सिर्फ मेडिकल क्षेत्र की करें तो भारत के कुल 1 लाख 7 हजार 400 भारतीय छात्र भारत से बाहर जा कर पढ़ाई कर रहे हैं. जिसमें चीन में 23 हजार, यूक्रेन में 18 हजार, रूस में 16 हजार 500, फिलीपींस में 15,000, किर्गिज़स्तान में 10 हजार, जॉर्जिया में 7500, बांग्लादेश में 5200, पोलैंड में 4 हजार जबकि आर्मेनिया में 3 हजार मेडिकल स्टूडेंट्स भारत से जा कर पढ़ाई कर रहे हैं. ये डाटा विदेश मंत्रालय द्वारा जारी किया गया है.

ये छात्र भारत छोड़ कर दूसरे देशों में जा कर मेडिकल की पढ़ाई कर रहे हैं क्योंकि बहुत से छोटे देश अब बहुत सस्ती दरों पर मेडिसिन की पढ़ाई करा रहे हैं. भारत में, बहुत बड़ी संख्या में छात्र मेडिसिन की पढ़ाई करना चाहते हैं, इसलिए टियर 2 और टियर 3 शहरों और कस्बों के छात्र एमबीबीएस के लिए अर्मेनिया या मंगोलिया जाने के लिए तैयार हैं.

भारत के पड़ोसी देश नेपाल, चीन और बांग्लादेश जैसे देशों से लेकर कजाकिस्तान और किर्गिस्तान तक भारत से छात्र मेडिसिन की पढ़ाई के लिए जा रहे हैं. विदेश मंत्रालय के ताजा आंकड़ों से पता चलता है कि भारतीय छात्र एक दर्जन से अधिक देशों में मेडिसिन की पढ़ाई कर रहे हैं. एक्सपर्ट्स का कहना है की छात्रों के मेडिसिन की डिग्री के लिए बाहर जाने के सिर्फ दो कारण हैं, पहला हाई फी स्ट्रक्चर और दूसरा सीट की कमी. भारत में शीर्ष 10% छात्र जिन्हें मेडिसिन की पढ़ाई करनी है उनको एडमिशन देने के लिए पर्याप्त सीट नहीं हैं.

भारत से हर साल सैकड़ों की संख्या में बच्चे मेडिकल की पढ़ाई करने यूक्रेन, बेलारूस, कजाकिस्तान जैसे देश जाते हैं. आखिर ऐसा क्यों होता है कि भारत में 600 से अधिक सरकारी-निजी मेडिकल कॉलेज हैं, लेकिन छात्र अपना देश छोड़कर सात समंदर पार जाते हैं. वहां पढ़ाई कर रहे स्टूडेंट्स ने इस बारे में बात करते हुए अपनी मजबूरी बताई. उनका कहना है कि भारत में सरकारी मेडिकल सीट हासिल करना बहुत कठिन है और प्राइवेट यूनिवर्सिटी में करोड़ों रुपए फीस देकर पढ़ने की उनकी क्षमता नहीं है. साथ ही यहां सीटों का आरक्षण इतना है कि कई बार अच्छे नंबर आने के बाद भी सीट नहीं मिलती इसलिए उन्हें यूक्रेन जैसे देश जाकर पढ़ाई करना पड़ रहा है.

भारत में मेडिकल की पढ़ाई के लिए दाखिला तभी मिलता है, जब स्टूडेंट NEET का एग्जाम क्लीयर करता है. इसके लिए उसे कड़ी मेहनत करनी पड़ती है. यूक्रेन में मेडिकल प्रवेश परीक्षा भी नहीं होती है. केवल इंटरव्यू के आधार पर ही स्टूडेंट का दाखिला MBBS कोर्स के लिए हो जाता है.

एक्सपर्ट्स के अनुसार दिलचस्प बात यह है कि “विदेशी” टैग छोटे शहरों के कई उम्मीदवारों को भी आकर्षित करता है. “छात्र अपने रिश्तेदारों को बताते हैं कि वे मेडिसिन की पढाई के लिए विदेश जा रहे हैं. आर्मेनिया या जॉर्जिया जाने वाले केवल यह कहते हैं कि वे यूरोप में मेडिसिन की पढ़ाई के लिए जा रहे हैं.

जबकि यूक्रेन जैसे देशों में मेडिसिन की पढ़ाई करने गए छात्रों के पेरेंट्स का कहना है कि भारत में पढ़ाई उतनी अच्छी नहीं जितनी की वहां है. यही कारण है कि वहां से पढ़कर आने वाले बच्चे भारत में नेशनल एग्जिट टेस्ट को आसानी से क्रैक कर ले रहे हैं.

टाइम्स ऑफ़ इंडिया के इस विषय पर एक रिपोर्ट को रीट्वीट करते हुए आनंद महिंद्रा ने अपनी कंपनी MD और CEO CP गुरनानी को टैग करते हुए लिखा, “मुझे नहीं पता था कि भारत में मेडिकल कॉलेजों की इतनी कमी है. क्या हम महिंद्रा यूनिवर्सिटी के परिसर में एक मेडिसिन की पढ़ाई के लिए संस्थान स्थापित करने का विचार कर सकते हैं?”

आनंद महिंद्रा के इस ट्वीट पर लगातार स्टूडेंट्स और बाकि लोगों की प्रतिक्रियाएं आ रही हैं. लोगों का कहना है की आपका आईडिया अच्छा है पर प्लीज अपने मेडिकल कॉलेज की फी अफोर्डेबल रखें, ना की बाकी कॉलेज की तरह करोड़ों रुपये वसूलें. वहीं एक यूजर ने लिखा की स्टूडेंट्स अपना सपना पूरा कर रहे थे और इसमें कुछ भी गलत नहीं है. कई लोग अपनी वापसी के बाद और FMGE पास करने के बाद भी बेरोजगार होंगे. कुछ राज्यों में डॉक्टर रोगी अनुपात स्कैंडिनेवियाई देशों से मेल खा रहा है.